Blue Drum Case: पति सौरभ राजपूत की हत्या के चर्चित मामले में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाने वाले जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा (Blue Drum Case) इन दिनों अपने कड़े फैसले के साथ-साथ अदालत में अपनाए गए उनके अनूठे अंदाज को लेकर भी सुर्खियों में हैं। फैसला सुनाने से ठीक पहले महाभारत का संदर्भ देना और सजा सुनाने के तुरंत बाद इस्तेमाल किए गए पेन को डस्टबिन में डाल देना, अदालत में उनके इन दोनों पहलुओं ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
23 साल बाद मेरठ में आया मृत्युदंड का फैसला
इस सनसनीखेज हत्याकांड में लगभग 13 महीने तक लंबा मुकदमा चला, जिसके दौरान अदालत में कुल 126 तारीखों पर सुनवाई हुई। आखिरकार जिला जज ने मुस्कान और साहिल को सौरभ की हत्या का दोषी करार देते हुए दोनों को फांसी की सजा सुनाई। इस ऐतिहासिक फैसले को मेरठ के न्यायिक इतिहास में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है, क्योंकि यहाँ करीब 23 साल बाद किसी मामले में मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है।
फैसले से पहले दिया महाभारत का संदर्भ
सजा पर अपना निर्णय सुनाते हुए जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा ने महाभारत का प्रभावशाली उल्लेख किया और न्याय एवं दंड के मूल सिद्धांतों पर अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि अपराधी ने जैसा जघन्य अपराध किया है, उसके अनुसार उसे उचित दंड देना ही सच्चा न्यायिक धर्म है। उनके इस कथन का मुख्य उद्देश्य समाज में यह संदेश देना था कि कानून का असली मकसद समाज में सुरक्षा, शांति और व्यवस्था बनाए रखना है।
बाघ और जंगल का उदाहरण देकर समझाई बात
अपनी बात को और गहराई से रखते हुए जज ने बाघ और जंगल का एक सटीक उदाहरण दिया। उनके अनुसार, यदि बाघ अपने जंगल में है, तो जंगल सुरक्षित रहता है, और यदि जंगल सुरक्षित बचा है, तो बाघ भी सुरक्षित रहता है। इसी तरह कानून मनुष्यों के लिए ही बनाया गया है, जो उनकी सुरक्षा करता है और उनके सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित करता है। समाज में यह कड़ा संदेश जाना बेहद जरूरी है।
सजा सुनाने के बाद जज ने डस्टबिन में फेंका पेन
कोर्टरूम में फैसले के दौरान जज का एक और कदम खासा चर्चा का विषय बन गया। मृत्युदंड का कड़ा आदेश सुनाने के बाद उन्होंने जिस पेन से हस्ताक्षर किए थे, उसे तुरंत कचरे के डब्बे (डस्टबिन) में डाल दिया। चूंकि यह फैसला दो लोगों को फांसी की सजा देने से जुड़ा था, इसलिए इस पर लोगों का विशेष ध्यान गया। हालांकि, पेन को फेंकने के पीछे जज की तरफ से कोई आधिकारिक वजह सामने नहीं आई है, इसलिए इस कदम के पीछे किसी विशेष मंशा का दावा करना उचित नहीं है। फिलहाल, उनका यह अंदाज हर तरफ चर्चा का विषय बना हुआ है।
5 महीने पहले ही मेरठ आए थे जिला जज
आपको बता दें कि जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा ने मेरठ की अदालत में कार्यभार संभाले अभी महज पांच महीने ही हुए थे। इतने कम कार्यकाल में उनके सामने आए इस अत्यंत चर्चित हत्याकांड के फैसले ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया है। उन्होंने गत 30 सितंबर को मुस्कान और साहिल को हत्या का दोषी पाया था, और इसके लगभग दो सप्ताह बाद दोनों को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
नीले ड्रम में छिपाए गए थे शव के टुकड़े
इस सनसनीखेज मामले में मुस्कान और साहिल पर सौरभ राजपूत की बेरहमी से हत्या करने और उसके शव के टुकड़े करके एक नीले ड्रम में छिपाने का गंभीर आरोप था। इस वीभत्स घटना ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरी थीं। गौरतलब है कि मेरठ में इससे पहले वर्ष 2003 में एक डॉक्टर को मौत की सजा सुनाए जाने का मामला सामने आया था, और अब करीब 23 साल बाद आए इस नए फैसले ने पुराने पन्नों को फिर से ताजा कर दिया है।
