छाल छीलकर पेड़ों को तड़पा-तड़पा कर मारने की क्रूरता, बचाने के लिए छत्तीसगढ़ पहुंचे ‘ट्री डॉक्टर’! खास ‘सर्जरी’ से लौटाएंगे जंगलों की हरियाली

Udanti Sitanadi Tiger Reserve: छत्तीसगढ़ के धमतरी और गरियाबंद ज़िलों में फैले उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व (USTR) के अंदर एक गंभीर मामला सामने आया है।…

Udanti Sitanadi Tiger Reserve: छत्तीसगढ़ के धमतरी और गरियाबंद ज़िलों में फैले उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व (USTR) के अंदर एक गंभीर मामला सामने आया है। यहाँ के करका (Udanti Sitanadi Tiger Reserve) गाँव में अतिक्रमणकारियों ने लगभग 500 से ज़्यादा पेड़ों को ‘गर्डलिंग’ यानी पेड़ के तने के चारों ओर से छाल हटाकर भारी नुकसान पहुँचाया है। इस प्रक्रिया से पेड़ों तक पोषक तत्वों की आपूर्ति रुक जाती है, जिससे धीरे-धीरे उनके सूखकर मरने का खतरा पैदा हो गया है।

क्या होती है ‘गर्डलिंग’ प्रक्रिया और ड्रोन सर्वे के खुलासे
विशेषज्ञों के अनुसार, ‘गर्डलिंग’ एक ऐसी खतरनाक प्रक्रिया है जिसमें पेड़ के तने के चारों ओर की छाल का हिस्सा निकाल दिया जाता है, जिससे पेड़ अंदर से कमज़ोर होकर अंततः सूख जाता है। वन विभाग ने 22 सितंबर से 10 अक्टूबर के बीच DGPS-युक्त ड्रोन सर्वे और ISRO की पुरानी सैटेलाइट तस्वीरों (2010 और 2016) की मदद से एक निरीक्षण किया। इस सर्वे में यह बात सामने आई कि रिज़र्व के भीतर कुल 2,500 से ज़्यादा पेड़ (मुख्य रूप से साल, बीजा और तेंदू) इस स्थिति में पाए गए हैं, और पिछले एक दशक में हज़ारों पेड़ों को साफ़ कर दिया गया है।

पेड़ों को बचाने के लिए ‘ट्री डॉक्टर’ और ‘ब्रिज-ग्राफ्टिंग’ तकनीक का सहारा
हाल ही में नुकसान झेले गए पेड़ों को बचाने के लिए वन विभाग ने एक विशेष पहल शुरू की है। इसके तहत ‘प्रोजेक्ट वृक्ष फाउंडेशन’ के संस्थापक और ‘ट्री डॉक्टर’ के नाम से मशहूर विशेषज्ञ विजय निशांत टाइगर रिज़र्व का दौरा करेंगे। प्रभावित पेड़ों को पुनर्जीवित करने के लिए ‘सर्जरी’ और ‘ब्रिज-ग्राफ्टिंग’ तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इस तकनीक के तहत छाल कटे हिस्से पर एक स्वस्थ टहनी को ग्राफ्ट किया जाता है, ताकि क्षतिग्रस्त ऊतकों (tissues) को फिर से जोड़कर पेड़ में पोषक तत्वों का संचार फिर से शुरू किया जा सके।

स्थानीय पारंपरिक ज्ञान और कड़े सुरक्षा इंतजामों पर जोर
USTR के उप निदेशक वरुण जैन ने इस बात पर जोर दिया है कि जैव विविधता और महानदी नदी के उद्गम क्षेत्र के रूप में इस टाइगर रिज़र्व की रक्षा करना बेहद जरूरी है। विभाग पारंपरिक तरीकों (जैसे घाव पर गोबर-मिट्टी का लेप लगाना) के साथ-साथ अब विशेष विशेषज्ञों की मदद से सफलता दर बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इसके साथ ही, स्थानीय आदिवासी समुदायों और वनवासियों की पारंपरिक पारिस्थितिक जानकारी का भी लाभ लिया जा रहा है, ताकि जंगलों को बहाल किया जा सके और दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जा सके।