US-Iran Diplomacy: अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत शुरू, ट्रंप के बयान से पाकिस्तान गायब

US Iran Talks: अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बातचीत शुरू होने की कोशिशों के बीच पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता को लेकर बड़े…

US Iran Talks: अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बातचीत शुरू होने की कोशिशों के बीच पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता को लेकर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US Iran Talks) ने सोमवार को स्पष्ट किया कि ईरान के साथ यह बातचीत उनके कहने पर हो रही है और इसमें खाड़ी के देशों—सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर—की भूमिका बेहद अहम रही है। खास बात यह है कि अपने इस बयान में ट्रंप ने पाकिस्तान का दूर-दूर तक कोई जिक्र नहीं किया।

ट्रंप के बयान के मायने और खाड़ी देशों का दखल
ट्रंप के अनुसार, सऊदी अरब, UAE और कतर ने ही अमेरिका को ईरान पर किसी भी बड़े सैन्य हमले से पीछे हटने और कूटनीति व बातचीत का रास्ता अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। मौजूदा बातचीत का मुख्य एजेंडा होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े पेचीदा मुद्दों का समाधान तलाशना है। हालांकि, दूसरी तरफ ईरान ने ट्रंप के सीधे बातचीत शुरू होने के दावों को सिरे से खारिज किया है। ईरान का कहना है कि फिलहाल उनकी बातचीत केवल ओमान के साथ होर्मुज क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही को लेकर ही हो रही है।

तो क्या पाकिस्तान मध्यस्थता से पूरी तरह बाहर हो गया है?
जून 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच हुए एक समझौते के बाद पाकिस्तान और कतर को औपचारिक तौर पर मध्यस्थ पक्ष घोषित किया गया था। उस समय कतर के विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया था कि वह पाकिस्तान के नेतृत्व वाली मध्यस्थता का समर्थन कर रहा है। 22 जून को स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में हुई हाई-लेवल बैठक में अमेरिका और ईरान के साथ कतर और पाकिस्तान दोनों ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी, जहाँ परमाणु मुद्दों और प्रतिबंधों पर चर्चा हुई थी।

राष्ट्रपति ट्रंप के ताजा बयान से भले ही यह संकेत मिल रहा हो कि मौजूदा कूटनीतिक चरण में खाड़ी देश ज्यादा आगे नजर आ रहे हैं, लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान मध्यस्थता की रेस से पूरी तरह बाहर हो चुका है।

पाकिस्तान की कूटनीतिक उलझन और खाड़ी देशों की सक्रियता
पाकिस्तान की दोहरी स्थिति: पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाने की है। एक तरफ वह ईरान के साथ अपने भौगोलिक और धार्मिक-सामाजिक रिश्तों का लाभ उठाना चाहता है, तो दूसरी तरफ अमेरिका और सऊदी अरब के साथ उसके रणनीतिक हित जुड़े हैं। यही जटिल संतुलन उसकी मध्यस्थता को कठिन बनाता है। हालांकि, यह भी सच है कि खुद जून महीने में ट्रंप ने पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता की सराहना की थी।

खाड़ी देशों की क्यों बढ़ी प्राथमिकता: सऊदी अरब, UAE और कतर इस पूरे संकट से सीधे तौर पर प्रभावित हैं। होर्मुज स्ट्रेट में तनाव का सीधा असर इन देशों की अर्थव्यवस्था, तेल के निर्यात और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ता है। यही वजह है कि वे अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी बड़े युद्ध को टालना चाहते हैं।

आगे की राह और पाकिस्तान का भविष्य
राष्ट्रपति ट्रंप का यह बयान पाकिस्तान के लिए एक कूटनीतिक झटके जैसा जरूर लग रहा है, लेकिन अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हुई है। इस समय दोहा और मस्कट कूटनीतिक वार्ताओं के मुख्य केंद्र बनते जा रहे हैं, जबकि पाकिस्तान की भूमिका पर्दे के पीछे सिमट सकती है या फिर वह अगले दौर की बातचीत में दोबारा सक्रिय हो सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस्लामाबाद इस पूरी प्रक्रिया में केवल एक सहायक मध्यस्थ बनकर रह जाएगा, या फिर वह आने वाले समय में अमेरिका और ईरान के बीच होने वाले किसी बड़े समझौते में अपनी केंद्रीय भूमिका वापस हासिल कर पाएगा। यदि ऐसा नहीं होता है, तो यह पाकिस्तानी कूटनीति के लिए एक बड़ा झटका साबित होगा।