Crude Oil Price Surge: पश्चिम एशिया में भड़के सैन्य संघर्ष की आग अब एक बार फिर आम इंसान की जेब झुलसाने के लिए तैयार है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव, हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में हमलों और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार (Crude Oil Price Surge) में कच्चा तेल (Crude Oil) 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया है। अगर कच्चे तेल के दाम लंबे समय तक इसी स्तर पर रहे, तो दुनिया भर में महंगाई का एक और नया दौर आना तय है। भारत से लेकर अमेरिका तक, गाड़ियों के फ्यूल टैंक से लेकर रसोई घर तक इसका सीधा असर देखने को मिलेगा।
रूट बदलने से समय और लागत में भारी बढ़ोतरी
हॉर्मुज पहले से ही बंद था और अब बाब-अल-मंदेब (Bab el-Mandeb) जलडमरूमध्य पर भी युद्ध का साया मंडराने लगा है। लाल सागर में हूती विद्रोही सऊदी अरब के तेल टैंकरों पर हमले कर रहे हैं, जिससे सऊदी अपना तेल अब स्वेज नहर के रास्ते एशियाई देशों में भेज रहा है।
इस वजह से समुद्री जहाजों को अब पूरे अफ्रीका महाद्वीप का चक्कर काटकर भारत, चीन और ताइवान जैसे देशों में आना पड़ रहा है:
यात्रा का समय: लाल सागर के रास्ते एशियाई देशों तक पहुँचने में पहले जहाँ 19 दिन लगते थे, वहीं अब 48 दिन का समय लग रहा है।
ईंधन खर्च: जहाजों का ईंधन खर्च 1.26 मिलियन डॉलर से बढ़कर सीधे 2.87 मिलियन डॉलर हो गया है।
अतिरिक्त शुल्क: स्वेज नहर से गुजरने के लिए लगभग 10 लाख (1 मिलियन) डॉलर का अतिरिक्त शुल्क भी चुकाना पड़ रहा है।
भारत के लिए कच्चे तेल का समीकरण
वर्ष 2025-26 में भारत ने अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 13% से 15% हिस्सा सऊदी अरब से आयात किया है। हालाँकि, पिछले कुछ समय से भारत रूस से अधिक क्रूड ऑयल खरीद रहा है।
रूस से आयात: जून 2026 में भारत ने रूस से रिकॉर्ड 2.64 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) तेल खरीदा, जो मई के मुकाबले लगभग 37.4% अधिक था।
सऊदी अरब से आयात: भारत ने जून में सऊदी अरब (मुख्य रूप से यानबू बंदरगाह) से 403,000 bpd तेल का आयात किया।
100 डॉलर प्रति बैरल क्यों है ‘क्रिटिकल लेवल’?
100 डॉलर प्रति बैरल का स्तर तेल बाजार में मनोवैज्ञानिक (Psychological) और आर्थिक (Economic) दोनों लिहाज से एक ‘वार्निंग थ्रेशोल्ड’ (चेतावनी सीमा) माना जाता है:
साल 2008: कच्चा तेल 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गया था, जिसके परिणामस्वरूप वैश्विक मंदी आई थी।
साल 2022: रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ब्रेंट क्रूड $100 के पार जाने से दुनिया भर में रिकॉर्ड महंगाई दर्ज की गई थी।
वर्तमान स्थिति: अमेरिका-ईरान तनाव के बाद क्रूड के $100 पार करने से पेट्रोल-डीजल और एलपीजी के दाम बढ़ने की आशंका गहरा गई है।
आम आदमी की जेब और अर्थव्यवस्था पर असर
कच्चा तेल सिर्फ गाड़ियों का ईंधन नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था का पहिया है। क्रूड महंगा होने से पेट्रोल, डीजल, एलपीजी (LPG) और जेट फ्यूल के दाम बढ़ते हैं।
परिवहन और खाद्यान्न: ताजी सब्जियां, फल और डेयरी प्रोडक्ट्स जैसी चीजें जो कोल्ड स्टोरेज और ट्रक ट्रांसपोर्ट पर निर्भर हैं, उनके दाम उछल सकते हैं।
मालभाड़ा: जहाजों, ट्रकों और मालवाहक उड़ानों का किराया बढ़ने से दैनिक उपयोग की सभी वस्तुएं महंगी हो जाएँगी।
भारत के सामने खड़ी 5 बड़ी चुनौतियाँ
दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक देश भारत के लिए क्रूड का $100 के पार जाना एक बड़ा झटका है, जिससे ये 5 प्रमुख चुनौतियाँ पैदा होंगी:
आयात बिल में बढ़ोतरी: तेल खरीदने के लिए देश से डॉलर की निकासी तेजी से बढ़ेगी।
रुपये पर दबाव: डॉलर मजबूत होगा और भारतीय रुपया कमजोर हो सकता है।
महंगाई (Inflation): ईंधन महंगा होने से रोजमर्रा का सामान महंगा होगा।
चालू खाता घाटा (CAD): देश का आर्थिक संतुलन बिगड़ने का खतरा रहेगा।
खुदरा कीमतों पर दबाव: यद्यपि सरकार और रिफाइनरियां शुरुआत में घाटा सहकर कीमतें स्थिर रखने की कोशिश करेंगी, लेकिन अगर क्रूड लंबे समय तक $100 के पार बना रहा, तो पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी करना सरकार की मजबूरी बन जाएगा।
