Gujarat High Court Kaju Katli Case: चंद रोज बाद रक्षाबंधन का त्योहार आने वाला है. इस त्योहार में जमकर मिठाई की खरीदारी होगी, जिसमें काजू कतली भी बड़े पैमाने पर बेचे और खरीदे जाएंगे. काजू कतली एक ऐसी लोकप्रिय मिठाई है जो तमाम मिठाई की दुकानों से लेकर (Gujarat High Court Kaju Katli Case) अब जनरल स्टोर पर भी आसानी से मिल जाती है. आपने अक्सर देखा होगा कि काजू कतली को आकर्षक बनाने के लिए उस पर चांदी का वर्क लगाया जाता है. हर ग्राहक यही सोचता है कि उसने जो काजू कतली खरीदी है, उस पर असली चांदी का वर्क चढ़ा हुआ है, लेकिन मुनाफे के चक्कर में कई दुकानदार चांदी की जगह एल्युमिनियम का वर्क भी इस्तेमाल कर लेते हैं.
क्या काजू कतली में एल्युमिनियम वर्क लगाना गैरकानूनी है?
यह सवाल अक्सर उठता है कि क्या मिठाई पर चांदी की जगह एल्युमिनियम का वर्क लगाना गैरकानूनी है या नहीं. इस मामले में गुजरात के एक मिठाई विक्रेता भानुभाई को पूरे 31 साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी, जिसके बाद जाकर गुजरात हाईकोर्ट ने उन्हें बड़ी राहत दी है. आइए जानते हैं कि पूरा मामला आखिर क्या था.
31 साल पुरानी कानूनी लड़ाई और फूड इंस्पेक्टर की जांच
यह मामला 9 मार्च 1995 का है, जब फूड इंस्पेक्टर मिस्टर चौधरी ने व्यारा स्थित भानुभाई की मिठाई की दुकान से 96 रुपये में काजू कतली खरीदी थी. जांच के लिए इस सैंपल को पहले भुज और बाद में गाजियाबाद की सेंट्रल फूड लेबोरेटरी में भेजा गया. दोनों जगहों की रिपोर्ट में सामने आया कि काजू कतली पर सिल्वर फॉयल की जगह एल्युमिनियम फॉयल का इस्तेमाल किया गया है. इसके बाद, 24 नवंबर 2006 को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने इसे मिलावट मानते हुए भानुभाई और उनके पार्टनर को 3 साल की जेल और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी.
हाईकोर्ट का फैसला और भानुभाई का बरी होना
भानुभाई ने इस फैसले के खिलाफ निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी और आखिरकार 17 जून 2026 को गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस हेमंत एम. प्रच्छक ने उन्हें इस मामले से पूरी तरह बरी कर दिया. कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, इस फैसले के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें रहीं, जिन्होंने भानुभाई के पक्ष को मजबूत किया.
नियम 14 का उल्लंघन और कानूनी तकनीकी पेंच
भानुभाई के बरी होने की पहली मुख्य वजह नियमों का पालन न होना थी. फूड इंस्पेक्टर चौधरी ने खुद क्रॉस-एग्जामिनेशन (पूछताछ) के दौरान स्वीकार किया था कि सैंपल लेने के लिए जिस कांच की बोतल का इस्तेमाल किया गया था, उसे पहले से साफ और सुखाया नहीं गया था. ‘प्रिवेंशन ऑफ फूड एडल्टरेशन रूल्स, 1955’ के नियम 14 के मुताबिक, सैंपल हमेशा पूरी तरह साफ, सूखी और लीकेज-प्रूफ बोतल या कंटेनर में ही लिए जाने चाहिए.
सेहत को नुकसान पहुंचाने का कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं
कोर्ट के फैसले का दूसरा और सबसे अहम आधार यह था कि सिर्फ एल्युमिनियम फॉयल का मिलना ही मिलावट साबित करने के लिए काफी नहीं है. अदालत के सामने ऐसा कोई मेडिकल या साइंटिफिक सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि काजू कतली पर लगा एल्युमिनियम फॉयल इंसानी सेहत के लिए वाकई नुकसानदायक है. गुजरात हाईकोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि बिना नुकसान के पुख्ता सबूत के केवल किसी अनाधिकृत पदार्थ की मौजूदगी को कानूनन ‘मिलावटी’ नहीं ठहराया जा सकता.
