“शराब छूट सकती है, लेकिन कबूतरों का शौक नहीं”: इकलौते बेटे की मौत के बाद परिंदों में बसती है अनवर की जान

Gaya Pigeon Man: कभी कबूतर संदेश पहुंचाने का सबसे भरोसेमंद जरिया हुआ करते थे। वक्त बदला और संचार के नए साधन आ गए, लेकिन कुछ…

Gaya Pigeon Man: कभी कबूतर संदेश पहुंचाने का सबसे भरोसेमंद जरिया हुआ करते थे। वक्त बदला और संचार के नए साधन आ गए, लेकिन कुछ लोगों के लिए इन परिंदों का आकर्षण आज भी बरकरार है। कबूतरों के प्रति ऐसा ही गजब का जुनून बिहार के गया शहर के मारूफगंज (Gaya Pigeon Man) में रहने वाले 58 वर्षीय अनवर रिजवान उर्फ ‘अन्नू’ में देखने को मिलता है। लोग प्यार से उन्हें ‘पीजन मैन’ के नाम से पुकारते हैं। उनके पास करीब 500 कबूतर हैं, जिनमें भारत के अलावा सऊदी अरब और पाकिस्तान की भी दुर्लभ नस्लें शामिल हैं। चार दशक से ज्यादा समय से कबूतर पाल रहे अनवर के लिए ये सिर्फ परिंदे नहीं, बल्कि उनके परिवार का अहम हिस्सा हैं।

बचपन के शौक से शुरू हुआ सफर, अब बन चुका है जिंदगी का हिस्सा
अनवर रिजवान बताते हैं कि उन्हें कबूतर पालने का शौक महज 13-14 साल की उम्र में लगा था, जब वह अपने ननिहाल से कुछ कबूतर लेकर आए थे। शुरुआत में यह सिर्फ एक साधारण शौक था, लेकिन धीरे-धीरे कबूतरों के प्रति उनका यह लगाव एक गहरे जुनून में बदल गया। आज 45 साल से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी उनका यह प्यार कम नहीं हुआ है। उनके पास बनारसी, इलाहाबादी, शाहजहांपुरी, कमगर, टैडी और गिरेहबाज जैसी कई बेहतरीन नस्लों के कबूतर हैं। इसके अलावा, उनके संग्रह में अमरसरे नस्ल का एक आकर्षक हरे-लाल रंग का कबूतर भी शामिल है, जिनकी देखभाल और ट्रेनिंग के लिए वह रोजाना समय निकालते हैं।

कबूतरों की डाइट और देखभाल पर खर्च होते हैं लाखों रुपये
अनवर अपने कबूतरों को पारंपरिक तरीके से उड़ान की ट्रेनिंग देते हैं, जिससे उनके कबूतर करीब 3 से 4 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरते हैं। सबसे खास बात यह है कि आसमान में कई घंटे बिताने के बाद भी वे वापस अपने ही ठिकाने पर लौट आते हैं। कबूतरों की सेहत और उड़ान क्षमता बनाए रखने के लिए अनवर उनके खानपान पर विशेष ध्यान देते हैं। उन्हें नियमित रूप से रागी, चना, मक्का, बाजरा, सरसों और तीसी जैसे पौष्टिक अनाज खिलाए जाते हैं। वहीं, उड़ान प्रतियोगिताओं से पहले उन्हें बादाम, काजू, किशमिश और हलवा दिया जाता है, जबकि पीने के लिए केवल आरओ का पानी उपलब्ध कराया जाता है। करीब 500 कबूतरों के खानपान और रखरखाव पर अनवर हर साल लाखों रुपये खर्च करते हैं।

कई प्रतियोगिताओं के विजेता और बेटे के गम में मिला सबसे बड़ा सहारा
कबूतर उड़ाने के इस शौक को अनवर ने प्रतियोगिताओं के मंच तक पहुंचाया है और वह अब तक लगभग 15 प्रतियोगिताओं में शानदार जीत हासिल कर चुके हैं। वह बिहार-यूपी स्तर की प्रतियोगिता में दो बार चैंपियन रह चुके हैं, इसके अलावा नेशनल स्तर पर आयोजित ‘उस्तादी कप’ में रनरअप का खिताब भी अपने नाम कर चुके हैं।

हालांकि, अनवर की जिंदगी में एक ऐसा काला दौर भी आया जब उनके इकलौते बेटे की बीमारी के कारण मौत हो गई थी, जिसने उन्हें अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया था। उस असहनीय सदमे से उबरना उनके लिए बेहद मुश्किल था। अनवर बताते हैं कि उस कठिन समय में इन कबूतरों के साथ और उनके बीच बिताए वक्त ने ही उन्हें संभलने का सबसे बड़ा सहारा दिया।

“शराब का नशा छूट सकता है, पर कबूतरों का शौक नहीं”
अनवर कहते हैं, “शराब का नशा तो छूट सकता है, लेकिन कबूतरों का शौक जिंदगी भर नहीं छूटता। ये मेरे परिवार के सदस्य हैं, और मरते दम तक इनका साथ निभाऊंगा।” आज उन्हीं 500 कबूतरों के बीच उनकी पूरी दुनिया बसती है। उनके लिए यह सिर्फ कोई शौक नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी जीने का एक खास और अटूट जरिया है।